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National

सेल्फी लेते समय इस शख्स ने प्रधानमंत्री के लिए कुछ ऐसा कहा कि भड़क गयी स्वरा भास्कर

बॉलीवुड एक्ट्रेस स्वरा भास्कर अक्सर सोशल मीडिया पर ट्रोल के निशाने पर रहती हैं। लेकिन इस बार एक शख्स ने उन्हें उनके साथ सेल्फी लेकर ही ट्रोल

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बॉलीवुड एक्ट्रेस स्वरा भास्कर अक्सर सोशल मीडिया पर ट्रोल के निशाने पर रहती हैं। लेकिन इस बार एक शख्स ने उन्हें उनके साथ सेल्फी लेकर ही ट्रोल कर दिया। सोशल मीडिया पर स्वरा का एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है। ये वीडियो महज़ तीन सेकंड का ही है, लेकिन इस वीडियो को कई बार शेयर और लाइक किया जा चूका है।

इस वीडियो में देखा जा सकता है कि एक शख्स स्वरा के साथ सेल्फी वीडियो रिकॉर्ड करता है और कहता है, ‘मैम आएगा तो मोदी ही।’ इस वीडियो को सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर किया जा रहा है। स्वारा भास्कर को हमेशा ही सोशल मीडिया पर सरकार और प्रधानमंत्री के खिलाफ लिखते बोलते हुए देखा जाता है।

इस वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही लोगों ने स्वरा भास्कर का मजाक उड़ाना और उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने ट्विटर पर इस वीडियो पर कमेंट कर कहा, ‘नया हिंदुस्तान है, सेल्फी लेगा भी और बेइज्जती भी करेगा।’ तो वहीं कुछ ने कमेंट किया, ‘स्वरा अब सेल्फी क्लिक करने में भी डरेंगी।’ तो कुछ लोगों ने इसपर कमेंट में लिखा, ‘सही बेइज्जती की है।’

जेएनयू की स्टूडेंट रह चुकी स्वरा भास्कर राजनीति पर अपनी खुलकर राय रखती हैं और काफी बोल्ड बयान भी दे देती हैं जिससे ज्यादातर फिल्मी कलाकार बचते हैं। अपने कॉलेज के ही कन्हैया के लिए प्रचार कर रही स्वरा बेगूसराय भी पहुंची थी।

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Maharashtra/Goa

VIDEO :खत्म हो रही है ‘सेहरी’ के लिए जगाने की मजबूत रवायत

आप माह-ए-रमजान में ‘उठो सोने वाले सेहरी का वक्त है उठो अल्लाह के लिए अपनी मगफिरत के लिए…’ जैसे पुरतरन्नुम गीत गाकर लोगों को सेहरी के लिए जगाने वाले फेरीवालों की सदाएं वक्त के साथ बेनूर होते समाजी दस्तूर

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आप माह-ए-रमजान में ‘उठो सोने वाले सेहरी का वक्त है उठो अल्लाह के लिए अपनी मगफिरत के लिए…’ जैसे पुरतरन्नुम गीत गाकर लोगों को सेहरी के लिए जगाने वाले फेरीवालों की सदाएं वक्त के साथ बेनूर होते समाजी दस्तूर के साथ अब मद्धिम पड़ती जा रही है। पुरानी तहजीब की पहचान मानी-जानी वाली सेहरी में जगाने की यह परंपरा दिलों और हाथों की तंगी की वजह से दम तोड़ती नजर आ रही है।

जानकरों कि मानें तो पहले के जमाने में खासकर फकीर बिरादरी के लोग सेहरी के लिए जगाने के काम जैसे बड़े सवाब के काम को बेहद मुस्तैदी और ईमानदारी से करते थे। बदले में उन्हें ईद में इनाम और बख्शीश मिलती थी। इसमें अमीर द्वारा गरीब की मदद का जज्बा भी छुपा रहता था। इस तरह फेरी की रवायत समाज के ताने-बाने को मजबूत करती थी लेकिन अब मोबाइल फोन, अलार्म घड़ी और लाउडस्पीकर ने फेरी की परंपरा को जहनी तौर पर गौण कर दिया है।

तंगदिली और तंगदस्ती (हाथ तंग होना) भी फेरी की रवायत को कमजोर करने की बहुत बड़ी वजह है। पहले लोग फेरीवालों के रूप में गरीबों की खुले दिल से मदद करते थे लेकिन अब वह दरियादिली नहीं रही।

जानकार कहते हैं कि सेहरी के लिए लोगों को जगाने का सिलसिला पिछले पांच-छह साल में कम होने के साथ-साथ कुछ खास इलाकों तक सीमित हुआ है। इसका आर्थिक कारण भी है।

रमजान में अब फेरीवाले लोग छोटे शहरों में ही रह गए हैं। इससे उन्हें ईद में अच्छी- खासी बख्शीश मिलती है, जो अब छोटे शहरों और गांवों में मुमकिन नहीं है। उन्होंने कहा कि सचाई यह है कि अब फेरी की परंपरा सिर्फ रस्मी रूप तक सीमित रह गई है। लोग अब सेहरी के लिए उठने के वास्ते अलार्म घड़ी का इस्तेमाल करते हैं और अब तो मोबाइल फोन के रूप में अलार्म हर हाथ में पहुंच चुका है लेकिन यह रमजान की बरकत और अल्लाह का करम ही है कि सेहरी के लिए जगाने की रवायत सीमित ही सही लेकिन अभी जिंदा है।

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National

पहली बार सामने आया आसमानी तबाही का वीडियो, ओडिशा में ‘फोनी’ चक्रवात से 12 लोगों की गई जान

चक्रवाती तूफान ‘फोनी’ से ओडिशा में कम से कम 12 लोगों की मौत हुई है। तूफान के दस्तक देने के एक दिन बाद शनिवार को राज्य के लगभग

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भुवनेश्वर : चक्रवाती तूफान ‘फोनी’ से ओडिशा में कम से कम 12 लोगों की मौत हुई है। तूफान के दस्तक देने के एक दिन बाद शनिवार को राज्य के लगभग 10,000 गांवों और शहरी क्षेत्रों में युद्धस्तर पर राहत कार्य शुरू किया गया।

अधिकारियों ने बताया कि 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रहे इस अत्यंत भयंकर चक्रवाती तूफान की वजह से शुक्रवार को पुरी में तेज बारिश और आंधी आयी। तूफान के कमजोर पड़ने और पश्चिम बंगाल में प्रवेश करने से पहले इसकी चपेट में आये कस्बों और गांवों में बहुत से घरों की छतें उड़ गयीं और कई घर पूरी तरह से बर्बाद हो गये।

अधिकारियों ने कहा कि आपदा के कारण मरने वालों की संख्या शुक्रवार को आठ थी, जो मयूरभंज जिले में चार और लोगों के मारे जाने के बाद बढ़कर 12 हो गई। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों से विस्तृत जानकारी आनी अभी बाकी है।

मयूरभंज जिले के आपात अधिकारी एस के पति ने कहा, बारीपदा में अलग-अलग स्थानों पर पेड़ गिरने से चार लोगों की मौत हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से बात की और तटीय राज्य में चक्रवात आने के बाद की मौजूदा स्थिति पर चर्चा की। प्रधानमंत्री ने राज्य सरकार को आश्वासन दिया कि केंद्र की तरफ से राज्य को लगातार सहायता मिलती रहेगी।

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Exclusive

International Labour day: जानिए आखिर 1 मई को ही क्यों मनाया जाता है मजदूर दिवस ?

दुनिया के इतिहास में 1 मई की तारिख मजदूर दिवस के रूप में दर्ज है. 1 मई 1886 में अमेरिका के शिकागो से शुरू हुआ यह सिलसिला

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दुनिया के इतिहास में 1 मई की तारिख मजदूर दिवस के रूप में दर्ज है. 1 मई 1886 में अमेरिका के शिकागो से शुरू हुआ यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. दरअसल इस दिन अमेरिका के लाखों मज़दूरों ने 8 घंटे काम की मांग को लेकर एक साथ हड़ताल शुरू की थी.इस हड़ताल में 11,000 फ़ैक्टरियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार हजदूरों ने हिस्सा लिया था. लेकिन भारत में लेबर किसान पार्टी ने 1 मई 1923 को मजदूर दिवस मानाने की शुरुआत की थी. मजदूर दिवस को लेबर डे , कामगार दिन, कामगार दिवस, अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में जाना जाता है.

ऐसा नहीं है कि अमेरिका में हुई मजदूरों की हड़ताल के बाद उन्हें उनका हक मिल गया था. अधिकारों की इस लड़ाई में कुछ लोगों की जान चली गई तो कुछ को अपना खून तक बहाना पड़ा था. दरअसल 1886 में हुई इस हड़ताल के दौरान दुर्भाग्यवस शिकागो की हेय मार्केट में विस्फोट गया.जिसके बाद पुलिस ने मजदूरों पर गोली चला दी. जिसमें बड़ी संख्या में मजदूर जख्मीं हुए तो वहीं सात मजदूरों की मौत हो गई.

इस घटना के बाद इसके बाद मजदूरों ने लगातार धरना- प्रदर्शन कर वेतन बढ़ाने और काम के घंटे कम करने के लिए दबाव बनाना शुरू किया. क्योंकि उस दौर में मजदूरों को सप्ताह के सात दिन 12-12 घंटे लंबी शिफ्ट में काम करना पड़ता था. फैक्ट्रियों में काम करने वाले बच्चों का काफी शोषण भी किया जाता था. ज्यादातर मामलों में उन्हें मुश्किल हालातों में काम करना पड़ता था . खदान और फार्म में काम करने वाले बच्चों के हालात काफी बुरे थे. मजदूरों द्वारा अपने हक़ के लिए आवाज उठाने के बाद 1889 में पेरिस में हुई अंतरराष्ट्रीय महासभा की बैठक में अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाये जाने का निर्णय लिया गया. लेबर डे के मौके पर दुनिया के 80 से अधिक देशों में छुट्टी होती है.

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