EXCLUSIVE : बैरक नंबर 10 और बाबा की खुदकुशी की कोशिश

फिल्म ‘संजू’ जल्द ही परदे पर आने वाली है. इस बीच हम पहली बार जेल के अंदर से संजय दत्त की ज़िंदगी से जुडी ऐसी कहानियां सामने ला रहे हैं. जिनके बारे में न तो पहले कभी सुना गया और न ही पढ़ा गया है.पहली बार संजय दत्त का वो राज़दार बोलेगा जिसने जेल के अंदर भी बाबा के लिए ड्रग्स का इंतज़ाम किया था बल्कि उसने और 93 धमाके के आरोपी मुहम्मद जिंद्रान ने मिलकर संजू बाबा कि ज़िंदगी बचाई थी.

बाबा की खुदकुशी की कोशिश

संजय दत्त ने जेल के बैरक में ही नशे की हालत में टॉयलेट के अंदर लगे नल से अपने गले में फंदा डालकर खुद को खत्म करने की कोशिश की थी. उन्हें ये नहीं मालूम थे की अंदर कमोड में कोई बैठा है. तभी मुहम्मद जिंद्रान जो टॉइलट में बैठकर अपने सिगरेट में गांजा भर रहा था उसकी नज़र बाब पर पड़ी और उसने तुरंत पतली सी डोरी को खींच कर तोड़ डाला था. नाइजीरियन रोबर्ट विलियम ओगबे ने चुपचाप से इस बात की जानकारी नीलेश को दी.नीलेश बाबा के सारे काम देखने के लिए उनके साथ रहता था.बाद में उसने धीरे से इसकी जानकारी बैरक के वार्डन को दे दी थी. संजय दत्त द्वारा ख़ुदकुशी की कोशिश के इस मामले को जेल के अंदर ही दबा दिया गया था.सर उनके पिता सुनील दत्त साहब और उस वक़्त के पुलिस कमिश्नर अमरजीत सिंह सांवरा को ही जानकरी थी.

बाबा के इस हरकत के बाद उन्हें फ़ौरन बाबा बैरक से निकलकर दस नंबर के ख़ास बैरक में भेज दिया गया था. मुहम्मद जिंद्रान और नीलेश भी उनके साथ वहां भेज दिया गया. नीलेश दोहरे हत्याकांड में पकड़ा गया था उसने मुंबई के गोवंडी इलाके में दो लोगों की हत्या कर दी थी और अदालत ने उसे दोहरे उम्र क़ैद की सजा सुनाई है. नीलेश इसी साल दिसंबर में जेल से रिहा हो जाएगा. नीलेश का दावा है की वो जब भी जेल से छूटेगा बाबा के पास ही जाएगा. बाबा ने उसे वादा किया है की वो उसे साथ रखेंगे और कुछ काम देंगे.

वहीँ बाबा का जेल का साथी मुहम्मद जिंद्रान 29 June 1998 में खार इलाके में गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी. संजू बाबा जब तक जेल में रहे मुहम्मद जिंद्रान ने ही उनके लिए विदेशी मार्लबोरो सिगरेट का इंतज़ाम करता था. मुहम्मद जिंद्रान पर धमाके में इस्तेमाल RDX रखने का आरोप था.

नीलेश ने बताया की 19 अप्रैल 1993 से अब तक बाबा 6 बार आर्थर रोड जेल में आ चुके हैं . हर बार वो उनके बैरक में रहा और बाबा का काम करता था. कई बार बड़े दत्त साहब ने उसके परिवार को मदद भी की थी. नीलेश ने बताया की जब पहली बार बाबा जेल आए तो वो चार रात सो नहीं पाए थे. उन्हें नशे की तलब लगी थी और जेल में ड्रग्स का मिलना मुश्किल नहीं था. लेकिन बाबा पर ख़ास ध्यान दिया जा रहा था. तब नीलेश ने असलम लंगड़ा से बाबा के लिए 40 रूपये में चरस खरीदकर लाया था. फिर भी बाबा शांत नहीं हुए वो अजीब सी बेचैनी में थे. रात भर सोते नहीं थे और सुबह जेल में बंद दूसरे आरोपी उन्हें सोने नहीं देते थे. सब आकर उनसे मिलना चाहते थे. उनसे पूछन चाहते थे, पहले तो बाबा ने उनसे बात भी की लकिन बाद में परेशान होने लगे.

कॉन्स्टिपेशन से दर्द से हुआ था बुरा हाल

शुरूआती दिनों में बाबा ने कुछ नहीं खाया पिया फिर बाद में जब घर से कुछ आया तो खाया. लेकिन गंदा टॉयलेट होने की वजह से उन्हें काफी परेशानी होने लगी. वो कई दिनों तक वो टॉयलेट नहीं गए जिससे उनके पेट में दर्द होने लगा. वो काफी परेशान और चिड़चिड़े हो गए थे. बाद में मुस्तफा डोसा ने उन्हें कोई दवा भिजवाई तब जाकर उन्हें आराम हुआ था.

बैरक नंबर 10 से बदली ज़िंदगी

खुद संजय दत्त भी कई बार कह चुके हैं की उनका आर्थर रोड जेल के बैरक नंबर दस से गहरा नाता है. बैरक नंबर दस में आने के बाद बाबा बहुत बदल गए थे. पूरे दिन बैठकर वो कैरम खेला करते थे. उस वक़्त जेल में पंखे नहीं थे. जिस वजह से बाबा बहुत परेशान रहने लगे. जब दत्त साहब जेल में उन्हें मिलने आए तो जेलर हिरेमठ के सामने बाबा ने पिता को अपनी परेशानी बताई. जेलर हिरेमठ ने ये कहते हुए अपने हाँथ खड़े कर दिए थे की वो इस में कुछ नहीं कर सकते. सरकार की तरफ से उन्हें कोई फंड नहीं आता. तब दत्त साहब ने सबसे पहले सर्कल 10 के सभी बैरक में पंखे लगवाए. फिर धीरे धीरे पूरे जेल में. बाद में आर्थर रोड में बने सभी बैरक में टीवी भी लगाया गया था.


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