आर्थिक राजधानी मुंबई में हर तीन बच्चे में एक बच्चा कुपोषित

प्रजा फांडेशन ने जो रिपोर्ट जारी किये हैं उसके बाद महाराष्ट्र सरकार और देश की सबसे बड़ी महानगर पालिका बीएमसी सवालों के घेरे में है।कोई यक़ीन करेगा की आर्थिक राजधानी मुंबई के बीएमसी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में तीन में से एक बच्चा कुपोषित है।पिछले तीन सालों में बीएमसी स्कूलों में पढ़ने वालों बच्चों में कुपोषण के मामलों में चार गुना का इजाफा हुआ है।

प्रशासन की लापरवाही और उदासीन रवैया से हर साल मुंबई में कुपोषण के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है।जो चिंता का विषय बना हुआ है।वही बीएमसी के आला अधिकारीयों की माने तो,  बीएमसी स्कूलों में आने वाले बच्चे गरीब और पिछड़े वर्ग से आते है जो अच्छे सुविधा से वंचित रहते है, और वो स्कूल में आने से पहले ही कुपोषण के शिकार हुए रहते है। 

प्रजा की रिपोर्ट की माने तो साल २०१३-१४ में १,५७,००० स्कूल के बच्चों का स्वस्थ परिक्षण किया गया था इनमे से ११ हज़ार बच्चे कुपोषण का शिकार हुए थे। वही साल २०१५ -१६ कुपोषण के मामले में ३४ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। प्रजा फाउंडेशन के मिलिंद म्हस्के ने बताया कि सरकार द्वारा बच्चों के लिए मिडेमिल जैसे कई कार्यक्रम चलाया जा रहा इसके बावजूद बच्चों में कुपोषण के मामले बढ़ रहे है जो नगरसेवकों कि कार्यप्रणाली पर सवाल उठता है।

हैरानी वाली बात तो ये है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा चलाये जा रहे “बेटी बचावों बेटी पढावों” अभियान चलाया जा रहा है इसके बावजूद कुपोषित बच्चों में सबसे अधिक लड़की कुपोषण कि शिकार हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2013 में कुल 11,831 कुपोषित बच्चों में 6,893 लड़कियां और 4,938 लड़के थे।प्रजा के मुताबिक, बच्चों में बढ़ रही इस समस्या के पीछे बजट का खर्च न होना भी एक वजह है। मिड-डे मिल के तहत बीएमसी स्कूलों को मिलने वाले कुल बजट का केवल 65 प्रतिशत ही 2015 में खर्च हुआ।


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