मुंबई का स्याह शुक्रवार एक झटके में खामोश हो गई 22 ज़िंदगियाँ

रोज की तरह मुंबई में लोग दो वक़्त की रोटी के लिए शुक्रवार की सुबह अपने घरों से दफ्तर के लिए निकले। दूर से सफर कर अपने दफ्तर के लिए एल्फिंस्टन स्टेशन पर पहुंचे। लेकिन शायद उन्हें ये पता नहीं था की उनका ये सफर जिंदगी की आखिरी सफर साबित होगी। कल कितने लोग घर से अपने बच्चों को ये कहकर निकले थे की वो शाम को आएंगे तो उनके लिए कुछ खाने को लाएंगे। कुछ ने तो घर पर जल्दी आने की बात कही थी। मुंबई के एल्फिंस्टन पर जो हादसा हुआ वो आज तक देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कभी नहीं हुआ था। पल भर में देखते ही देखते स्टेशन पर लाशों का ढेर लग गया था। चारो तरफ चीख पुकार सुनाई दे रही थी। कोई बाप अपनी आँखों के सामने अपने बेटी को मरते हुए देख रहा था।
श्रद्धा बरपे का अपने पिता से वो आखिरी शब्द….
हादसे की शिकार श्रद्धा बरपे हर रोज की तरह अपने पिता के साथ काम पर जाती। दोनों भी रोजाना कल्याण से परेल सफर कर काम पर जाते थे। उस दिन भी दोनों साथ परेल स्टेशन पर पहुंचे। ब्रिज पर लोगों की भीड़ होने की वजह श्रद्धा के पिता जल्दी जल्दी में आगे चले गए और श्रद्धा पीछे ही रह गई। और भीड़ में फंस गई।तभी उसने अपने पिता से कहा की पापा तुम जाओ भीड़ खत्म हो जायेगी तो वो चले आये गी। लेकिन ये शब्द श्रद्धा के जिंदगी का आखिरी सब्द साबित हुआ. उसके दस मिनट बाद ही ये हादसा हो गया।
हिलोनी देढिया 
इस हादसे में मरने वालों में से एक हिलोनी देढिया भी है। हिलोनी मुंबई के घाटकोपर में रहती है। वो एल्फिंस्टन के एक्सिस बैंक में काम पर थी। २४ वर्षीय हिलोनी रोज की तरह शुक्रवार की सुबह काम के लिए निकली थी।और वो हादसे की शिकार हो गई।हादसे की खबर मिलते ही हीलोनी के पिता ने अपने बेटी का हाल चल लेने के लिए उसके मोबाइल पर फ़ोन किया। जब हिलोनी के फ़ोन की घंटी बजी तो हिलोनी और फ़ोन को रिसीव भी किया गया।जैसे ही हिलोनी का फ़ोन रिसीव किया गया तो उसके पिता को लगा की हिलोनी शकुशल। लेकिन फ़ोन पर बात करने वाली हिलोनी नहीं थी बल्कि कम अस्पताल के डॉक्टर थे। जिन्होंने उसके पिता सुचना दी हिलोनी इस हादसे की शिकार हो गई. बेटी की मौत की खबर सुनते ही पिता के पैरों तले जमीन खिसक गई।
रोहित परब और आकाश दो भाई 
रोहित परब और आकाश के भाई अपनी पिता के धंदे में हाथ बटाने  के लिए घर से निकले थे । लेकिन दूकान तक पहुंचे ते तभी ये हादसा हो गया जिसमे रोहित की मौत हो गई आकाश पूरी तरह जख्मी हो गया।
अलेक्स करिया 
अलेक्स का फूलों का धंदा है उस दिन वो विरार से अपने घर दादर आ रहे थे। लेकिन उस दिन उन्होंने ने सोचा की वो एल्फिंस्टन से घर जाने के लिए सोचा था।
अंकुश जैस्वाल 
अंकुश जैस्वाल पेशे से इंजीनियर था. कुछ ही साल पहले उसके पिता की मौत हो गई थी। जिसके बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी अंकुश पर आ गई थी। उस दिन अंकुश फील्ड वर्क पर था.जिसकी हादसे में उसकी मौत हो गई।
शुबहा शेट्टी और सुजाता आलावा 
शुबहा और सुजाता दोनों पडोशी थे। दशहरा के मौके पर दोनों भी घर से शॉपिंग के लिए निकले थे।और इस हादसे की शिकार हो गई थी। शुभा और सुजाता दोनों कांजुरमार्ग के रहने वाली हैं। दोनों बेहद अच्छे दोस्त थे और यही वजह है की दशहरा के लिए फूल लेने भी साथ निकलीं। जब भगदड़ हुई तो पहले सुजाता उसमे फँस गयी थी लेकिन लोगों की मानें तो शुबहा दोस्त को छोड़ कर भागी नहीं बल्कि उन्हें खींचने की कोशिश करती रही। तब तक पीछे से भीड़ आयी और वो भी उसकी चपेट में आ गयीं।

चंद्रभागा इंग्ले की उम्र पच्चास साल थी और वो घरों में काम करती थीं 

कांजुरमार्ग की रहने वाली चंद्रभागा अपने घर से दादर गयीं थी।कुछ पैसे जुटाए थे तो इस बार वो दसहरा खूब धूम धाम से मनना चाहती थी। बच्चों को ये बोलकर दादर फूल मार्किट गयीं थी की वहां सस्ते फूल मिलेगा और वो ज़्यादा से ज़्यादा घर सजा सकें। पता नहीं आगे कभी फिर मौका मिले न मिले। शायद भगवान ने उनकी सुन ली चंद्रभागा अब कभी दशहरा नहीं मना पाएंगी।

चंद्रभागा के सात बच्चे हैं पति की काफी पहले ही हार्ट अटैक से मौत हो चुकी है. पड़ोसियों की मानें तो वो खुद भुकी रही लेकिन बच्चों को ज़रूर पढ़ाया. बाकी बच्चे तो कहीं न कहीं कुछ कर लेंगे लेकिन 10 साल की बेटी है पता नहीं उसका आगे क्या होगा।

विजय बहादुर,50
पेशे से दर्ज़ी, घनसोली के रहने वाले   

विजय भी रोज़ की तरह घर से काम के लिए निकले थे। पत्नी और बैठे को वादा किया था की आज जल्दी लौटेंगे ताकि दशहरा के दिन पूरा परिवार एक साथ बैठकर खाना खा सके। लेकिन अब कभी ये परिवार एक साथ नहीं बैठ पायेगा।

सुरेश जैस्वाल, 50
अँधेरी के रहने वाले, फल विक्रेता 

सुरेश भी घर से फूल खरीदने ही निकले थे। उनके लिए तो दोहरी ख़ुशी थी दशहरा के दूसरे दिन उनकी लाड़ली नौ साल की बेटी का जन्मदिन था. वो इसे धूमधाम से मानना चाहते थे। लेकिन अब उनकी ये लाड़ली शायद भविष्ये में कभी अपना जन्मदिन न मनाये। जब जब ये तारिक़ उसके ज़ेहन में आएगा वो एक नश्तर की तरह उसका कलेजा चलनी कर देगा। सुरेश का एक बेटा भी है जिसकी उम्र 10 साल है।

सुरेश की बहन कैलाशवती कहती हैं आप ही बताइये दस साल का ये मासूम घर परिवार कैसे चलाएगा। अब पढ़ाई छोड़कर पेट पालने के लिए यहाँ वहां भटकेगा. भगवान को भी सोंचना चाहिए था।

ज्योतिभा चव्हाण , 29
मुम्ब्रा , कस्टम एजेंट 

ज्योतिभा चव्हाण की पत्नी को अब तक नहीं बताया गया है की उनके पति अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनका पूरा परिवार सतारा में रहता है। परिवार के लोग अस्पताल से शव लेकर सीधा गाँव जाएंगे। ज्योतिभा चव्हाण खुद मुम्ब्रा के चॉल में रहते थे ताकि परिवार के लिए ज़्यादा से ज़्यादा पैसे बचा सकें। एक हफ्ते पहले ही उनकी पत्नी ने एक बेटे को जन्म दिया और उनकी तीन साल की एक बेटी भी है। ज्योतिभा चव्हाण का शव लेने उनका साला केम अस्पताल आया था। साले नितिन ने बताया की पता नहीं वो कैसे अपनी बहन से नज़र मिला पायेगा। ये सोंचकर भी रूह कांप जाता है की जिस बहन को लाल जोड़े में विदा किया था उसके लिए सफ़ेद रंग में ही लेकर जा रहा हूँ।

29 साल की टेरेज़ा फर्नांडिस दादर की रहने वाली थी और एक प्रायवेट कम्पनी में काम करती थी. 

उनका दफ्तर वहीँ एलिफिंस्टन रोड पर ही है। हमेशा टेरेसा चलकर ही दफ्तर जाती थीं लेकिन पता नहीं क्यों वो कल ट्रेन से गयीं और भगदड़ की चपेट में आ गयीं। पति रिचर्ड को यही बात खाए जा रही है की उन्होंने टेरेसा को ट्रेन से जाने से क्यों नहीं रोका।

मुश्ताक़ रियान , 45
मुंब्रा के रहने वाले प्रायवेट कंपनी में काम करते थे 

पीछले पांच साल से मुश्ताक़ एक ही कंपनी में काम कर रहे थे। उनका दफ्तर पास में ही परेल में ही था। वो दादर उतारकर टैक्सी से जाते थे। रोज़ वक़्त से पहले दफ्तर पहुँचने वाले मुश्ताक़ जब नहीं पहुंचे तो उनके दोस्तों ने उन्हें फ़ोन लगाया। लेकिन उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया, कुछ ही देर बाद ये खबर आ गई की एलिफिस्टन रोड पर ये हादसा हुआ और दफ्तर में काम करने वाले लोगों का शक सही साबित हुआ। मुश्ताक़ भी भगदड़ में फँस गए लोगों ने उन्हें अस्पताल पहुंचाने की कोशिश की, मगर काफी देर हो चुकी थी।

मुकेश मिश्रा, 22
घर सायन

मुकेश 6 महीने पहले ही मुंबई आया था और वो अपने किसी रिश्तेदार के साथ सायन में रहता था। मुकेश एक गारमेंट फैक्टरी में काम करता था। जब वो वक़्त पर दफ्तर नहीं पहुंचा तो उसके फैक्टरी के लोगों ने घर पर फोन करना शुरू किया. मुकेश के रिश्तेदार आशीष के मुताबिक़ उन्हें तभी शक हो गया था की कुछ गड़बड़ है. क्यूंकि मुकेश मुंबई में किसी को नहीं जानता था। पहले तो उन्हें इस बात का अंदेशा हुआ की हो सकता है की ट्रेन पकड़ने के दौरान कुछ हुआ हो। लेकिन जब अस्पताल से फ़ोन आया तब उन्हें पूरी जानकारी मिली।

मीणा वाल्हेकर 35
उल्हासनगर , सरकारी नौकरी 

मीणा अपने घर में कमाने वाली इकलौती थी। उसके कंधे पर बूढ़े माँ बाप के इलावा दो छोटे भाइयों की भी ज़िम्मेदारी थी। वो हर रोज़ उल्हासनगर से एलिफिस्टन अपने दफ्तर आती जाती थी। मीणा लेबर बोर्ड में फंड एडमिनिस्ट्रेटर के पद पर कार्यरत थी। लेकिन इस हादसे ने सिर्फ मीणा को नहीं मारा है बल्कि उसके पूरे परिवार को ही ख़त्म कर डाला है। बूढ़े माँ बाप को अब भी यक़ीन नहीं हो रहा है। भाई ये सोंच कर ही फफकने लगते हैं की उन्होंने सिर्फ अपनी बहन नहीं खोया है बल्कि एक माँ एक मार्गदर्शक खो दिया है। उपरवाले ने उनके साथ सही नहीं किया है।

मयूरेश हलदनकर, 20  साल
वर्ली निवासी.

घर के इकलौता कमाने वाला जिसके कंड़जों पर माँ बाप के इलावा एक छोटी बहन की ज़िम्मेदारी थी। मयूरेश मज़गाँव की एक कंपनी में काम करता था। वो दफ्तर के ही काम से निकला था. मगर भीड़ की चपेट में आ गया और अस्पताल ले जाने के क्रम में ही उसने दम तोड़ दिया।

प्रियंका पासलकर,

22 साल की प्रियंका एक निजी कंपनी में सॉफ्टवेर इंजिनियर थी। अपनी सोसाइटी में ब्रिलियंट के नाम से जानी जाती थी। सोसाइटी में रहने वाले उसके दोस्त खबर मिलते ही KEM हॉस्पिटल पहुँच गए थे। उन्होंने बताया की जो लोग उसे लेकर अस्पताल आये थे उन्होंने बताया की उसके पल्स चल रहे थे। अस्पताल में डॉक्टर नहीं बहुत कोशिश की लेकिन उसे रिवाइव नहीं कराया जा सका।

मसूद शेख और उनके दोस्त शकील दोनों मुम्ब्रा के रहने वाले हैं। रिश्ते में दोनों भाई लगते थे लेकिन लोग भाई से ज़्यादा दोस्त के तौर पर जानती थी। साथ उठना साथ बैठना साथ घूमने जाना। कई बार तो एक तरह का ही कपडा पहनना। शायद मौत भी साथ आई। दोनों घर से साथ ही निकले थे और दादर पहुंचे। जहाँ शकील पहले इस भगदड़ की चपेट में आये। लेकिन दोनों ने आखरी वक़्त तक एक दूसरे का हाँथ नहीं छोड़ा।


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