नौकरी से बढ़ा है मेरा ईमान, नहीं कटवा सकता दाढ़ी

खुद ईमान के पक्के बताने वाले महाराष्ट्र रिजर्व पुलिस फोर्स के जवान जहीरुद्दीन शमसुद्दीन बेदादे ने अपने दाढ़ी रखने पर अड़े रहे, और सुप्रीम कोर्ट का वो ऑफर ठुकरा दिया जिसमें इस शख्स को सहानुभूति के आधार पर फिर नौकरी जॉइन करने को कहा गया था। जहीरुद्दीन शमसुद्दीन बेदादे के वकील मोहम्मद इरशाद हनीफ के मुताबिक़, ‘इस्लाम में फौरी तौर दाढ़ी रखने की कोई अवधारणा नहीं है।’ हालांकि सर्वोच्या न्यालय के चीफ जस्टिस ने पुलिसकर्मी के वकील से कहा, ‘हम आपके लिए बुरा महसूस करते हैं। आप जॉइन क्यों नहीं कर लेते?’

महाराष्ट्र रिजर्व पुलिस फोर्स के जवान जहीरुद्दीन शम्सुद्दीन बेडाडे ने फोर्स में दाढ़ी रखने की इजाजत मांगी थी। लेकिन, नियमों के कारण उसे इजाज़त नहीं मिली और उसे सस्पेंड कर दिया गया था। इस के खिलाफ जहीरुद्दीन ने हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

साल 2012 में जहीरुद्दीन ने  दाढ़ी रखने की इजाजत मांगी, जो उसे मिल भी गई। लेकिन फिर नियम में बदलाव किए गए और जहीरुद्दीन को शुरू में दाढ़ी रखने की इजाजत दी गई थी, बशर्ते वह छंटी हुई, छोटी और साफ हो। मगर कुछ ही दिनों में महाराष्ट्र रिजर्व पुलिस फोर्स के इस मंजूरी को वापस ले लिया। जवान जहीरुद्दीन ने ऑर्डर फॉलो नहीं किया और अपनी दाढ़ी बढ़ाना जारी रखा। लिहाजा, उसे सस्पेंड कर दिया गया।

हालकि बॉम्बे हाई कोर्ट ने 12 दिसंबर 2012 को इस जहीरुद्दीन के खिलाफ फैसला दिया था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा था कि फोर्स एक सेक्युलर एजेंसी है और यहां अनुशासन का पालन जरूरी है। साथ ही अदालत ने यह भी कहा था कि दाढ़ी रखना मौलिक अधिकार नहीं है, क्योंकि यह इस्लाम के बुनियादी उसूलों में शामिल नहीं है।

इसके बाद जहीरुद्दीन बेदादे ने राहत के लिए सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने जनवरी 2013 में उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। इसके बाद से ही केस सुनवाई के लिए पेंडिंग है। अदालत में ज़हीर के वकील ने उस वक्त सैन्य बलों के लिए 1989 के एक सर्कुलर का हवाला देते हुए कहा था कि नियमों में दाढ़ी रखने की इजाजत है। वकील की यह भी दलील थी कि इस्लाम के हदीस कानून के तहत दाढ़ी रखना जरूरी है और यह पैगंबर मोहम्मद की तरफ से बताई गई जीवन शैली का मामला है।


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