विडंबना देखिए आधुनिक भारत में अंतिम संस्कार की जगह नहीं

लगातार देश के प्रधानमंत्री ये दावा कर रहे हैं की भारत आज अपने स्वर्णकाल में पहुँच चूका है। उनकी सरकार का सिर्फ एक ही मकसद है सबका साथ सबका विकास। लेकिन मुंबई से सटे मीरा-भयंदर इलाके से जो तस्वीर सामने आ रही है। वो सरकार के तमाम दावों की पोल खोलती है।  क्या आज सरकार इस लायक भी नहीं है की वो लोगों के अंतिम संस्कार के लिए कम से कम सही सुविधा मुहैया करा सके। अगर हां तो फिर क्यों लोगों को अपने परिजनों का अंतिम संस्कार बारिश के मौसम में खुले में करना पड़ रहा है। लोगों ने तमाम सरकारी दरवाज़े खटखटा लिए आखिर कोई उनकी क्यों नहीं सुन रहा है।

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बरसात अपने चरम पर और ऐसे में मीरा भायंदर इलाके में लोगों को ख़ास तौर पर कई परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ख़ास तौर पर जीवन के आखरी सफर यानी अंतिम संस्कार के दौरान। कभी तिरपाल के नीचे अंतिम संस्कार, तो कभी बारिश रुकने का कई बार तो लोगों को जलती चिता तक छोड़कर जाना पड़ता है।और उसके आगे तो हम बता भी नहीं सकते की उस वक़्त लोगों पर क्या बीतता होगा?  जब वापस लौटने पर उन्हें बारिश में बुझ चुकी अधजली चिता दिखती है।

लोगों का कहना है की काशी मीरा के वरसोवे गांव में आजादी के 70 साल बाद भी मीरा भायंदर महानगर पालिका एक श्मशान भूमि नही बना पाई है।  जिसकी वजह से गांव वालो को अपने मृत परिजनों का दाह संस्कार खुले आसमान के नीचे करने पड़ता है। ऐसा ही नजारा कल देखने को मिला जब तेज बरसात में गाव वाले मृत का दाह संस्कार तिरपाल के शेड के नीचे करते दिखे जहां मीरा भायंदर के कई नेता मीरा भायंदर के लोगो मेट्रो और स्मार्ट सिटी का सपना दिखा कर वोट बटोरते है।  तो वही दूसरी तरफ आम नागरिक मूल भूत सुविधाए भी नही मिल रही है।

 


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