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गर्मी ने ठीक से अपनी तपिश भी नहीं दिखाई है और महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में पानी सैंकड़ों फ़ीट नीचे पाताल में नहीं मिल रहा है। अप्रैल महीने में ही गर्मी के सितम बढ़ने के साथ ही नहर, नाले और कुएं तक साथ छोड़ने लगे हैं। इसका असर अब ग्रामीण क्षेत्रों में नजर भी आने लगा है। महाराष्ट्र के नासिक जिले का बर्डेवाड़ी गांव दो भागों में बंटा है, इस गांव में करीब 500 आदिवासी परिवार के घर हैं। गर्मी और सूरज की तपीश से जमीन में दरार पड़ गई है। बस्ती के सामने 10 फीट गहरा एक कुआं है। लेकिन पानी का एक बून्द मैयस्सर नहीं, पानी के आस में लोगों ने उस कुएं को खोद खोद कर 100 फ़ीट गहरा कर दिया है।

हालत इतनी बुरी हो गई है परिवार का प्यास बुझाने के लिए महिलाएं और बच्चियां अपनी ज़िन्दगी दाव पर लगाकर हर रोज़ कुएं में उतरती हैं लेकिन मिलता है सिर्फ एक ग्लास से गंदा पानी । हर रोज़ एक मटका पानी भरने में करीब 2 से 3 घंटा लगता है। बस्ती के हर घर की यही कहानी है। यह क्रम पूरे दिन चलता रहता है।

गर्मी शुरू हो चुकी है। ऐसे में पानी की कहानी के कई किस्से आपको पढऩे को मिल जाएंगे। पर, आज हम एक ऐसे गांव की कहानी आपको बता रहे हैं, जहां प्यास बुझाने के लिए हर रोज कई जिंदगियां मौत से लड़ती हैं। 3286 लोगों की आबादी वाला ये गांव नाशिक के बर्डेवाड़ी गांव की कहानी है।

पाताल में पानी होता तो वहां से भी निकाल लाते
पूरे इलाके में पानी का भीषण संकट है। गाँव के आस पास के पांच किलोमीटर के दायरे में सिर्फ दो कुएं हैं जिनमें से दोनों सूख चुके हैं। पीने के पानी का दूसरा स्रोत गांव से 14 किलोमीटर दूर एक कुआं हैं, जहां से पानी निकालना मौत को दावत देने जैसा है। पर, जिंदा रहने के लिए यहां के ग्रामीण इतने कठोर हो चुके हैं कि यदि पाताल में भी पानी होता तो वे वहां से भी निकाल लाते हैं।

जानलेवा है ये कुआं
जो कुआं इस पूरी ग्राम पंचायत की प्यास बुझाता है, उसमें पानी जमीन से करीब 100 फीट नीचे है। पानी दूषित है, फिर भी गांव वाले कुएं में नीचे उतरकर पानी लाते हैं और पीते हैं। महिला और बच्चों को पानी भरने के लिए खुद कुएं में उतरना पड़ता है। इस कुएं पर घाट नहीं है, ऐसे में कुएं में झांकने पर भी इसमें गिरने का डर बना रहता है

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