युपी में कमल की विजय गाथा के दो सुत्रधार – विकास और हिंदूत्व

युपी विधानसभा चुनाव के नतीजों से ना सिर्फ विपक्ष बल्की खुद बीजेपी के कई बडे नेता भी हैरान है। हैरानी इसलिये क्युंकि बीजेपी को विश्वास था की वो सबसे बडी पार्टी बनकर उभरेगी। लेकिन जीत का आंकडा 300 के पार चला जायेगा इसकी कल्पना खुद शायद प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह भी ने नहीं की थी। पिछले तीन दशकों में ये पहली बार हैं जब किसी एक दल को 300 से ज्यादा सीटें मिली हैं। ऐसे में सवाल ये हैं की आखिर ऐसा क्या हुआ की युपी के मतदाताओं ने साइकिल को पंचर कर दिया, हाथी को हाँपने पर मजबूर कर दिया, और युपी के लडकों को फेल कर बाहरी मोदी को पास कर बहुमत से कमल को खिला दिया।

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सवाल अब भी यही हैं की आखिर देश के सियासत की दिशा और दशा तय करने वाले और धार्मिक-जातीय समीकरण के जटील जाल में उलझे युपी में कमल खिलने की क्या वजहें है। अगर इन नतीजों का आकंलन करें तो एक बात स्पष्ट हैं की जनता बदलाव चाहती थी। युपी में काम बोलने का नारा हो या बहन जी को फिर आने दो का बीएसपी के नारे पर मोदी के सबका साथ सबका विकास का नारा भारी पडा। लेकिन ये जो ऐतिहासीक जीत बीजेपी को मिली है उसकी नींव लोकसभा चुनाव के बाद ही रखी जा चुकी थी। आरएसएस और बीजेपी के चाणक्य अमित शाह खामोशी से मोदी के पक्ष में महौल बना रहें थे। किसी को इसकी भनक नहीं लगी, दादरी हो या कैराना, ट्रिपल तलाक हो या फिर लव जिहाद सब इसी सायलंट स्ट्रैटीजी का हिस्सा थे। कहने के लिये तो युपी के मतदाताओं ने जातपात से उठकर सिर्फ विकास के नाम पर वोट दिया लेकिन विकास की बुर्के की आड में जो सांप्रदायिक पृष्ट भुमी बनायी गई उसी का ही नतीजा हैं की बीजेपी ने जीत के सार रिकॉर्ड तोड दिये।

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बीजेपी का साइलेंट हिंदू कार्ड इसलिये भी कहना गलत नहीं होगी की जिस राज्य में 18 फिसदी आबादी मुस्लमानो की हो। वहां पर जातीगत समीकरणों के आधार पर टिकट बांटने वाली बीजेपी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया। साफ हैं बीजेपी जानती थी की अगर वो एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देती तो उसकी ध्रुवीकरण की रणनिती फेल हो जाती। अमित शाह ने अपने 2014 लोगसभा चुनाव के फॉर्म्युले को आधार बनाकर इस बार भी उसी सायलंट हिंदू कार्ड को चला था। मोदी और बीजेपी की इस कामयाबी के पिछे सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ही वजह हैं ऐसे भी नहीं है की बल्की अखिलेश के पांच वर्षों के कार्यकाल में हुए कारनामे और कॉग्रेस के साथ उनका साथ भी जिम्मेदार है। बदले वक्त के साथ खुद को बदलने के लिये तैयार ना होना मायावती की सबसे बडी भुल रही हैं, जिसका फायदा भी बीजेपी को हुआ। इन नतीजों से ये भी साफ हो गया की युपी में युवाओं की नजर में मोदी सबसे बडे युथ आयकॉन हैं ना की राहूल अखिलेश। बहरहाल, इन चुनाव से एक सबक तो सभी पार्टीयों को सिख लेना चाहिये की वक्त मोदी का चल रहा है।

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किसी जमाने में INDIRA IS INDIA का नारा बदलकर MODI’S INDIA बन चुका है। अगर विपक्षी दलों को अपनी प्रासंगिकता को बचाकर रखना हैं और मोदीमय हो चुकी बीजेपी को हराना हैं तो अपनी सियासत करने तरीकों को बदलना होगा। क्युंकि, अब उनका मुकाबला उस अमित शाह और मोदी से हैं जो ना सिर्फ अपने अपने विरोधीयों को हराने में यकीन रखतें हैं बल्की उनकी हस्ती मिटाने के लिये जी जान लगा देतें है।कॉग्रेस मुक्त भारत करने के अपने एजंडे पर मोदी काफी सफलता हासिल कर चुके है । क्षेत्रिय दलों ने अगर अभी कमर नसी कसी तो उनका भी वही हाल हो सकता हैं जो धीरे धीरे कॉग्रेस का हो रहा है।


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