सरकार से हक़ की लड़ाई लड़ते लड़ते, ज़िंदगी की लड़ाई हार गए किसान धर्मा पाटिल

प्रशासन के खिलाफ अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे धुले जिले के सिंधखेड़ा के किसान धर्मा पाटिल अपनी ज़िंदगी की लड़ाई हार गए है। 80 वर्षीय किसान धर्मा पाटिल का निधन हो गया है। बीती रात मुंबई के जेजे अस्पताल में धर्मा पाटिल ने अंतिम साँसे ली। धर्मा पाटिल 22 जनवरी की रात दस बजे मंत्रालय के बाहर जहर पीकर ख़ुदकुशी करने की कोशिश की थी। जिसके बाद धर्मा पाटिल को मुंबई के जेजे अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वो पिछले एक हफ्ते से अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे थे। आखिरकार बीती रात मौत ने धर्मा पाटिल को अपने आगोश में ले लिया।

पाटिल के मौत के बाद उनके घर वालों ने उनके पार्थिव शरीर को लेने से इंकार कर दिया है। उनका कहना है कि जबतक सरकार उनके जमीन का उचित दाम और उन्हें शहीद भूमि पुत्र कर दर्जा नहीं देती तबतक उनका अंतिम संस्कार नहीं करेंगे।

क्या है पूरा मामला ?

धर्मा पाटिल धुले के सिंधखेड़राजा में रहते है। थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए अर्जित जमीन का उन्हें कम मुआवजा मिला था। सरकार ने धर्मा पाटिल को 5 एकड़ जमीन का महज चार लाख रूपए दिया था। जो अन्य किसानों के मुकाबले कम था। जमीन का सही दाम मिलने के लिए वो चार से पांच महीनों से जिला अधिकारी के दफ्तर का चक्कर लगा रहे थे। लेकिन अधिकारियों ने उनकी एक न सुनी। जिसके बाद वो मुंबई में आकर मंत्रालय में गुहार लगाई। वहां पर भी सुनवाई न होते देख धर्मा पाटिल ने २२ जनवरी की रात को जहर पीकर ख़ुदकुशी करने की कोशिश की।

जाते जाते रौशनी दे गए धर्मा पाटिल

किसान धर्मा पाटिल के निधन के बाद उनके परिवार वालों ने उनकी आँखे दान करने का फैसला लिया है। पाटिल के इलाज दौरान उनके बेटे नरेंद्र पाटिल ने अंगदान का फॉर्म भरा है। परिवार के इस फैसले से किसी को रौशनी मिल गई है।


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