स्नाइपर दबाते ट्रिगर और मारा जाता दाउद इब्राहिम, लेकिन तभी एक कॉल नें……

उस दिन थी तारीख-13 सितंबर, 2013 जगह- पाकिस्तान के कराची शहर का क्लिफ्टन रोड। और वक्त-शाम के 4 बजे से 6 बजे के बीच का।

हमेशा का तरही उस शाम भी रोज की तरह कराची के क्लिफटन रोड पर मौजूद एक बंगले से गाड़ियां का एक बड़ा क़ाफ़िला बाहर निकला था। सारी गाड़ियाँ एक जैसी थी। काले शीशे से ढकी हुई और हर खिड़की से एक 47 Rifle का मुँह बाहर की तरफ़ निकला हुआ। कोई भी इस क़ाफ़िले को देखता उसे समझनें में देर नहीं लगती की ये कोई VVIP मुवमेंट है। इन गाड़ियों के क़ाफ़िले में एक मर्सिडीज एस क्लास और बाक़ी सब लैंड क्रूजर। इन गाड़ियों को उस सफ़ेद महल नुमे बंगले से कुछ ही किलोमीटर दूर डिफेंस हाउसिंग सोसायटी में मौजूद रिटायर्ड फौजी अफसरों की मेस तक जाना था। उन लोगों से मिलनें जाना था जो पाकिस्तानी ख़ुफ़िया ऐजेंसी आईएसआई के बड़े अधिकारी हैं। और उस मेस में एक ख़ास भारत विरोधी मिटींग होनी थी। वही जो गाड़ियों का बड़ा क़ाफ़िला निकला था उसमें से एक गाड़ी में कोई और नहीं बल्कि भारत मोस्ट वांटेड अपराधी दाऊद इब्राहिम था।

वहीं दुर से कुछ निगाहें इस क़ाफ़िले पर बड़ी बारीकी से नज़र रखे हुए थे। सुत्र बतातें है की किसी ख़ास मक़सद से दुनिया के अलग अलग देशों से होते हुए पाकिस्तान के कराची शहर पहुँचे थे।

कौन थे जो नज़र रखे हुए थे ?

अगर ख़ुफ़िया ऐजेंसी सूत्रों की मानें तो गाड़ियों के क़ाफ़िले पर नज़र रखेनें वाले लोग, दरअसल भारत के सुपरबॉय थे जो एक विशेष ऑपरेशन के लिए वंहा पहुँचे थे। सुत्र बताते हैं कि साल 2013 में भारतीय ख़ुफ़िया ऐजेंसी रॉ नें ऑपरेशन किल दाऊद की प्लानिंग की थी। जिसे करीब चार साल पहले 13 सितंबर को अंजाम देना था। सुत्र बतातें हैं की इस ऑपरेशन को अंजाम देनें के लिए रॉ नें अपनें 9 जांबाज अफसर चुनें थे। और 13 सितंबर की शाम को दाऊद इन्हीं 9 जांबाज रॉ एजेंटों के सामने से गुजर रहा था। वो अपनें बंगले से निकलकर डिफेंस हाउसिंग सोसायटी की मेस में जा रहा था, जहां हर शाम वो जाया करता था।

रॉ के वो 9 सुपरबॉय

सूत्रों के मुताबिक भारत की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी रॉ नें ऑपरेशन किल दाऊद को अंजाम देनें के लिए दुनिया भर में अलग अलग स्टेशनों पर तैनात अपनें 9 जांबाज एजेंट इकट्ठे किए थे। जिन्हें एक ख़ास नाम दिया गया था ‘सुपर बॉय’। इन्ही सुपर बॉय पर जिम्मेदारी थी उस शाम दाऊद इब्राहिम को करांची के क्लिफ्टन रोड पर मारने की। ताकि दुनिया के सामनें पाकिस्तान को बेनक़ाब किया जा सके। बताया जा सके की कैसे पाकिस्तान, भारत के दुश्मनों को पनाह देकर उन्हें इस्तेमाल कर रहा है।

तैयार थे स्नाइपर्स और चलने वाली थी गोली

कहतें हैं ना कई बार वैसा नहीं होता है जैसा की आप सोंचते हैं। उस शाम शायद क़िस्मत भी दाऊद का साथ दे रही थी। दाऊद की गाड़ियों का क़ाफ़िला पुरी तेज़ी से कराची की सड़कों को रौंदती हुई आगे बढ़ती जा रही थी, दुसरी तरफ़ रास्ते में अलग अलग फैल कर भारत के 9 सुपर बॉय तैयार बैठे थे। बस इंतेजार था उस कार का जिसमें बैठकर दाऊद गुजरनें वाला था।

दाऊद गुज़रा भी और बच भी गया, कैसे ?

प्लान अपने हिसाब से चलता तो 13 सितंबर, 2013 माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम का आखिरी दिन साबित होने वाला था। सवाल ये है कि दाऊद सामने था तो 9 सुपर बॉय की बंदूकों से गोलियां क्यों नहीं निकलीं? आखिर उन्होंने दाऊद इबाहिम को गोली क्यों नहीं मारी?

ऑपरेशन किल दाऊद

रॉ ने दाऊद को ख़त्म करने का पूरा ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया था। लेकिन सवाल था कि पाकिस्तान में घुसकर इस ऑपरेशन को कैसे अंजाम दिया जाए। चुकी दाऊद जिस इलाके में रहता है वो पाकिस्तान का सबसे सुरक्षित इलाका है। जहाँ आई इस आई के कई बड़े अफसर और सैन्य अधिकारी रहते हैं। इस वजह से वहां कि सुरक्षा भी बेहद चाक चौबंध रहती है। ऐसे में इस प्लान को अमलीजामा कैसे पहनाया जाए? इतना ही नहीं दाऊद की सुरक्षा को भेद पाना भी आसान नहीं था। वो हमेशा तीन चरणों की सुरक्षा के घेरे में रहता है। ऐसे में सेंध कैसे लगाई जाए?

खतरनाक मोसाद ने दी ट्रेनिंग

खुफिया सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के मुताबिक रॉ किसी भी हालत में ‘ऑपरेशन किल दाऊद’ को अंजाम देना चाहता था। इसी बीच के रॉ एक अधिकारी ने इस बाबत ऑस्ट्रेलिया में इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद एक बड़े अधिकारी से इसके लिए मदद मांगी। मोसाद इस शर्त पर मदद करने को तैयार हो गया कि किसी भी हालत में इस ऑपरेशन के पास या फेल होने पर उनकी एजेंसी का नाम नहीं आएगा। इसके बाद मोसर और रॉ कि एक टीम ने इस ऑपरेशन का पूरा ब्लू प्रिंट बनाया। इस ब्लू प्रिंट को तैयार करने से पहले अमेरिका का ऑपरेशन ओसामा बिन लादेन कि तमाम बारीकियों को स्टडी किया गया। ताकि ऑपरेशन ओसमा कि तर्ज पर ही ऑपरेशन दाऊद की सफलता की 100 % गैरंटी हो।

दाऊद के घर में घुसकर मारने कि थी तैयारी

सूत्र बताते हैं, इस ब्लूप्रिंट में एक दिक्कत थी दाऊद को ढूंढ़ना। क्यूंकि ओसामा कि तर्ज पर दाऊद के घर में घुसकर मारना तो किसी भी हालत में संभव नहीं था। इतना ही नहीं खुद पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी भी अपने इनपुट्स के मुताबिक़ दाऊद और उसके परिवार का पकिस्तान में ही मूवमेंट्स कराती रहती थी। इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने सभी 9 एजेंट्स को इस ऑपरेशन को अंजाम देने की खास ट्रेनिंग दी थी। ‘हिट-रन एंड lost’ यानी ठोको भागो और भीड़ में लापता हो जाओ। ऑपरेशन का मकसद साफ़ था की उन्हें दाऊद को गोली मारनी है और मौके से भाग जाना है। अगर पकडे जाने का डर हो तो बाकी का काम दूसरे एजेंट्स जानते थे। किसी के हाथ ना लगो बस यही याद रखना था । इसके बाद एजेंट्स ने दाऊद की निगरानी का बेहद मुश्किल और जोखिम भरा काम शुरू किया । खुफिया एजेंट्स लगातार दाऊद के एक-एक कदम पर नजर रखने लगे।

दाऊद के दुश्मनों ने की मदद

खुफिया सूत्रों की मानें तो अधिकारियों ने तय किया कि इस काम को अंजाम देने से पहले अपने 9 एजेंटों को तैयार कर लिया जाए। फिर सभी को किसी तरह पाकिस्तान में सेट किया जाए और फिर ऑपरेशन की तैयारी शुरू की जाए। इन सबके लिए भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी ने करीब डेढ़ साल का वक़्त लिया। इसके बाद दाऊद के तमाम दुश्मनों कि लिस्ट निकाली गयी। इनमे से ज़्यादातर वो थे जो पाकिस्तान में थे और जिन्हें दाऊद के पाकिस्तान में रहने से दिक्कत थी। ये लोग इस बात से नाराज़ थे कि पाकिस्तानी एजेंसी आईइसआई दाऊद को ज़्यादा तवज्जो दे रही थी।

अंडरकवर एजेंट्स ने दाऊद के दुश्मनों के गैंग ज्वाइन की

अपनी जानकारी को और पुख्ता करने के लिए कई एजेंटों ने दाऊद के दुश्मनों के गैंग में भर्ती हो गए। जिसके बाद उन्हें उन जगहों पर एक्सेस मिलने लगा था जहाँ अक्सर दाऊद अपने लोगों के साथ उठता बैठता था। जब तमाम जानकरी इकठ्ठा हो गयी तो अंडरकवर एजेंट्स से मिली जानकारी मिलाकर एक बेहद खुफिया प्लान तैयार किया गया। इस प्लान का नाम दिया गया ‘करांची सिटी’ और 9 एजेंट्स की टीम को सुपर बॉय नाम का कोड नाम दिया गया।

फुलप्रूफ थी प्लानिंग, लेकिन !

जो जानकारी सुपरबॉयस ने इकठ्ठा की थी उसके मुताबिक, दाऊद इब्राहिम हर शाम 4 से 6 बजे के बीच घर से निकल कर कहीं जाता था। दाऊद रोज़ दो घंटे के लिए कहीं गुम हो जाता था। एजेंसी ने इसी वक़्त पर अपने ऑपरेशन को अंजाम देने को सोंचा। पहले एजेंट्स ने उसके मूवमेंट्स की कई तस्वीरें खींची। उसका वीडियो भी बनाया था ताकि कोई गफलत ना हो।

फिर आया ऑपरेशन किल वाला दिन

आखिरकार ऑपरेशन की तारीख भी आ गई। सूत्रों के मुताबिक तय वक़्त और जगह पर कराची में दाऊद को मारने के लिए रॉ के 9 सुपर बॉय पहुंच गए थे। सभी एजेंट्स को सूडान, नेपाल और बांग्लादेश के पासपोर्ट के जरिए कराची पहुंचाया गया था। ताकि कहीं कोई गलती न हो और भारत पर शक की कोई गुंजाइश ना रहे। ये भी तय था की इन्हें हथियार लोकली दिया जाएगा और इस पूरे ऑपरेशन में वैसे हथियारों का इस्तेमाल होगा जो पाकिस्तान में आसानी से मिलते हैं और अक्सर गैंगवार या हमले में इस्तेमाल होते हैं। यानी के AK47 जो एजेंट्स को कराची में ही मुहैया कराए गए थे।

दरगाह के पास गोली मारी जानी थी दाऊद को

सूत्र बताते हैं कि, कराची में दाऊद इब्राहिम को सुल्तान शाह के नाम से जानते हैं। हर रोज वो शाम चार से छह बजे के बीच कराची के 105/2 डिफेंस हाउसिंग सोसायटी में मौजूद एक मेस में जाता था। खुफिया सूत्रों के मुताबिक ये मेस पाकिस्तानी सेना के रिटायर्ड फौजियों की है। उस शाम भी दाऊद अपनी मर्सिडीज एस क्लास में बैठा और लैंड क्रूजर उसे एस्कॉर्ट करती हुई मेस की तरफ चल पड़ी थी।

जैसे ही गाडी दिखी भारतीय खुफिया एजेंसी के प्लान के मुताबिक 9 सुपर बॉय रास्ते में फैल गए। दाऊद को करीब पांच किलोमीटर का रास्ता तय करना था। सूत्र बताते हैं कि उस पांच किलोमीटर के स्ट्रेच पर रास्ते में शाह अब्दुल्ला गाजी दरगाह पड़ती है। दरगाह जिस जगह पर है वहां बहुत ज्यादा भीड़ नहीं होती है और उस जगह के पास प्लान को एक्सेक्यूट करने में कोई दिक्कत नहीं होगी। लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी।

किसके कॉल ने बचाया दाऊद को

सूत्र बताते हैं कि उस शाम को दाऊद का बच पाना नामुमकिन ही था। 9 सुपर बॉय अपनी-अपनी पोजीशन ले चुके थे। बस वो दाऊद को निशाने पर लेने वाले ही थे कि तभी अचानक वो हुआ जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी। इस पूरे ऑपरेशन को लीड कर रहे सुपर एजेंट्स को इस ऑपरेशन के कमांडर यानि 9 एजेंटों में से सबसे सीनियर एजेंट के पास एक फोन आया और ऑपरेशन को वहीँ ख़त्म करने को कहा गया। हालांकि सूत्र फ़ोन करने वाले कि पहचान तो उजागर नहीं करना चाहते लेकिन इतना ज़रूर कहते हैं कि उस फ़ोन कॉल ने दाऊद को नई ज़िन्दगी दे दी।


Close Bitnami banner
Bitnami