0

आप माह-ए-रमजान में ‘उठो सोने वाले सेहरी का वक्त है उठो अल्लाह के लिए अपनी मगफिरत के लिए…’ जैसे पुरतरन्नुम गीत गाकर लोगों को सेहरी के लिए जगाने वाले फेरीवालों की सदाएं वक्त के साथ बेनूर होते समाजी दस्तूर के साथ अब मद्धिम पड़ती जा रही है। पुरानी तहजीब की पहचान मानी-जानी वाली सेहरी में जगाने की यह परंपरा दिलों और हाथों की तंगी की वजह से दम तोड़ती नजर आ रही है।

जानकरों कि मानें तो पहले के जमाने में खासकर फकीर बिरादरी के लोग सेहरी के लिए जगाने के काम जैसे बड़े सवाब के काम को बेहद मुस्तैदी और ईमानदारी से करते थे। बदले में उन्हें ईद में इनाम और बख्शीश मिलती थी। इसमें अमीर द्वारा गरीब की मदद का जज्बा भी छुपा रहता था। इस तरह फेरी की रवायत समाज के ताने-बाने को मजबूत करती थी लेकिन अब मोबाइल फोन, अलार्म घड़ी और लाउडस्पीकर ने फेरी की परंपरा को जहनी तौर पर गौण कर दिया है।

तंगदिली और तंगदस्ती (हाथ तंग होना) भी फेरी की रवायत को कमजोर करने की बहुत बड़ी वजह है। पहले लोग फेरीवालों के रूप में गरीबों की खुले दिल से मदद करते थे लेकिन अब वह दरियादिली नहीं रही।

जानकार कहते हैं कि सेहरी के लिए लोगों को जगाने का सिलसिला पिछले पांच-छह साल में कम होने के साथ-साथ कुछ खास इलाकों तक सीमित हुआ है। इसका आर्थिक कारण भी है।

रमजान में अब फेरीवाले लोग छोटे शहरों में ही रह गए हैं। इससे उन्हें ईद में अच्छी- खासी बख्शीश मिलती है, जो अब छोटे शहरों और गांवों में मुमकिन नहीं है। उन्होंने कहा कि सचाई यह है कि अब फेरी की परंपरा सिर्फ रस्मी रूप तक सीमित रह गई है। लोग अब सेहरी के लिए उठने के वास्ते अलार्म घड़ी का इस्तेमाल करते हैं और अब तो मोबाइल फोन के रूप में अलार्म हर हाथ में पहुंच चुका है लेकिन यह रमजान की बरकत और अल्लाह का करम ही है कि सेहरी के लिए जगाने की रवायत सीमित ही सही लेकिन अभी जिंदा है।

पुणे: अपनी ही गर्भवती बेटी और दामाद को ज़िंदा जलाया, दोहराई गई फिल्म सैराट की कहानी

Previous article

बॉलीवुड की हॉट बाला दिशा पटानी इन दिनों सोशल मीडिया पर लगा रही आग , देखे फोटो

Next article

You may also like

Comments

Comments are closed.